शनिवार, 7 जून 2014

विशाल सरकार लेकिन प्रशासन लापता - साइबर पुलिस व्यवस्था

साइबर पुलिस
आईएऐस, आईपीएस, ऐवम अन्य अनेक प्रकार के सरकारी अधिकारी, कर्मचारी, और उनके साथ अनगिनत सांसद, विधायक, पार्षद, आदि - कुल मिलाकर जितना लंबा-चौड़ा सरकारी तामझाम भारत में मौजूद है उतना शायद ही ब्रह्मांड में कहीं और मौजूद हो लेकिन एक चीज़ जो अनिवार्यतः होनी चाहिए, सिरे से नापैद है। वह लापता तत्व है प्रशासन। संसार में जितने भी अग्रणी विकसित राष्ट्र हैं, उन सब में एक सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था उपस्थित है। विकसित देशों में प्रशासन और विधि व्यवस्था सुदृढ़ होते हुए भी वहाँ आमतौर पर सरकारें छोटी और कम खर्चीली हैं। भारत की स्थिति उलट है। एक दिल्ली शहर का ही उदाहरण लें तो सांसदों के अलावा शहर की अपनी विधान सभा है और उसके अलावा कई पालिकायेँ भी अपने पार्षदों के साथ मौजूद हैं। इसके अलावा आईएऐस, आईपीएस, ऐवम अन्य सरकारी कर्मियों की फौज मौजूद है। लेकिन जब बात प्रशासनिक व्यवस्था की आती है तो देश का सबसे प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण नगर होने के बावजूद भी वह अपने आसपास के पिछड़े देशों के किसी सामान्य पिछड़े शहर जैसा ही है जहां एक बड़ी जनसंख्या पीने के पानी जैसी मूलभूत पर मामूली सुविधा से भी वंचित है। बिजली-पानी की आपूर्ति हो, सड़कों के निर्माण और रखरखाव की बात, कूड़े का निस्तारण हो या नदी-नालों की सफाई, हम आज तक एक नगर, देश की राजधानी को भी रहने लायक नहीं बना सके, बाकी भागों की तो बात ही जाने दीजिये।

विकसित देशों में समस्याओं के अध्ययन और निराकरण में स्थानीय जनता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। साथ ही साथ वहाँ जनता शिक्षित भी होती है (उदाहरणार्थ, अमेरिका में  12वीं कक्षा तक शिक्षा निशुल्क और अनिवार्य है) और अपना हित, राष्ट्रीय हित और मानवता का हित समझने और सुरक्षित रखने की समझ भी रखती है। दिल्ली के लिए अनेक विशेषज्ञों, कमेटियों, विभागों, कर्मियों, और सुझावों के होते हुए भी पेयजल, शिक्षा और सुरक्षा जैसी मूलभूत समस्याओं तक का निराकरण न कर पाना कहीं न कहीं इस बात का सबूत है कि हमारे देश में जिन कंधों पर ज़िम्मेदारी छोड़ी गई है वे अपने काम के लिए फिट नहीं हैं। तो क्यों न सक्षम लोगों को ज़िम्मेदारी के पदों पर लाने का प्रयास किया जाये?
* भारतीय जनता भी जिम्मेदार प्रशासन की हकदार है - हर बस्ती, गली, गाँव में *
बदायूं के एक कस्बे में दो नाबालिग बहनों के अपहरण के बाद उनके परिजन अपराधियों की पूरी जानकारी लेकर पुलिस चौकी में फरियाद ही कराते रह जाते हैं और पुलिस वहाँ से हिलने में इतना समय लेती है कि अपराधी दोनों की निर्मम हत्या के बाद उनके शवों को घसीटते हुए ले जाकर एक विशाल पेड़ पर टाँग कर चले जाते हैं। इंसानियत को शर्मसार करने वाली यह घटना अपराधियों के बढ़ते हौसलों का प्रतीक तो है ही, इसके बाद राज्य प्रशासन और सरकार के लगभग हर प्रतिनिधि का क्षमा मांगने के बजाय लगातार यह स्पष्टीकरण देते रहना कि ऐसी घटनाओं के बावजूद उनकी सरकार औरों से बेहतर है, यही दर्शाता है कि हम इंसानियत और इन्सानों द्वारा शासित नहीं हैं। आश्चर्य नहीं कि इस घटना के चर्चा में आने के बाद ऐसी ही अनेक घटनाएँ एकदम से सामने आ गईं।

जम्मू और काश्मीर में मुजाहिदीन द्वारा किए जा रहे अमानवीय कृत्य हों या छत्तीसगढ़ में माओवादियों के कंगारू कोर्ट के नाम पर जघन्य हत्यायेँ और घात लगाकर सड़कें और स्कूल नष्ट करना, हर जगह हम जन-जीवन की असुरक्षा और प्रशासन की अकुशलता ही देखते हैं। अंतर बस इतना ही है कि उत्तर प्रदेश में यह अपराध उतने संगठित और विस्तारित नहीं हैं जितने आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में।

इसी प्रकार देश में कहीं भी, कभी भी द्वेष से भरे असंतुष्ट समुदाय एक दूसरे के खून के प्यासे बन जाते हैं। मुजफ्फरनगर हो या पुणे, हालिया दंगों ने फिर यही सिद्ध किया है कि देश के अधिकांश भाग में सरकारें भले ही बड़ी हों, लेकिन प्रशासन लापता है। खासकर पुणे के दंगों में जिस प्रकार इन्टरनेट पर, फेसबुक,वाट्सऐप, यूट्यूब और ब्लॉग्स आदि पर खुलेआम फैलाई गई नफ़रत की बात सामने आई है, उससे यही लगता है कि सोशल मीडिया के खतरों के बारे में हमारा प्रशासन कान में तेल डाले बैठा है। कहीं विचारधारा के नाम पर आतंकवादियों और उनके सफेदपोश संरक्षणदाताओं की प्रशंसा होती है, कहीं अनाधिकारिक नक्शे बांटे जाते हैं और कहीं देश-विदेश की संपादित हिंसक तसवीरों के जरिये असंतोष भड़काया जाता है। प्रशासन को मुस्तैद होने की ज़रूरत है, सोशल मीडिया पर भी और सड़क पर भी। लेकिन पुलिस की साइबरसेल या तो अक्षम हैं, या शायद हैं ही नहीं। एक आम नागरिक अगर ध्यान आकृष्ट करना भी चाहे तो उसे पता ही नहीं कि अव्वल तो यह काम किया कैसे जाये और दूसरे, यदि पुलिस को बता भी दिया जाये तो क्या सचमुच कोई कार्यवाही होगी भी या नहीं।

कुछ सुझाव
  • एक केंद्रीय पुलिस साइबर सेल या केंद्रीय साइबर पुलिस जैसी संस्था बने जो इन्टरनेट की निगरानी करे और अपराधियों के खिलाफ पुख्ता सबूत इकट्ठे कर त्वरित कार्यवाही करे। 
  • आवश्यक हो तो इस कार्य के लिए त्वरित कोर्ट भी बनाया जाये
  • ऐसे अपराधों की शिकायत कहाँ और कैसे की जाये, इसकी समुचित जानकारी जनता को मीडिया, डाकघरों के बुलेटिन बोर्ड, जन-परिवहन पर विज्ञापन आदि द्वारा उपलब्ध कराई जाये।
  • केंद्रीय साइबर पुलिस के पोर्टल पर जनता को शिक्षित किया जाये कि कौन से कृत्य अपराध की श्रेणी में आते हैं, ताकि भावुक जन अंजाने में अपराध के सहयोगी न बनें।
  • अफवाहें फैलने के अवसर बनाने से पहले ही विवादित विषयों पर तथ्यात्मक आधिकारिक जानकारी प्रकाशित की जाये। 
  • धार्मिक सेनाओं के निर्माण, पंजीकरण, सदस्यता अभियान, वेबसाइट्स आदि के बारे में नियम तय किए जाएँ और इसकी जानकारी सार्वजनिक की जाये।   
  • केंद्रीय साइबर पुलिस के पोर्टल पर अपराधियों के विरुद्ध हुई सफल/असफल कार्यवाहियों की सांख्यिकी उपलब्ध कराई जाये ताकि इस शक्ति के दुरुपयोग की संभावना न्यूनतम रहे।
  • पुलिस प्रशासन को जन-सामान्य की रक्षा की ज़िम्मेदारी बार-बार याद दिलाई जाये। यह उनके प्रशिक्षण का अनिवार्य अंग हो। साथ ही उनकी तैयारी ऐसी भी हो कि वे अपराधियों से न केवल जूझ सकें बल्कि सदा विजयी हों।

रविवार, 25 मई 2014

नदी प्रबंधन व विकास


गंगा सिंधु सरस्वती च यमुना गोदावरी नर्मदा,
कावेरी शरयू महेन्द्रतनया चर्मण्वती वेदिका,
क्षिप्रा वेत्रवती महासुरनदी ख्याता जया गण्डकी,
पूर्णाःपूर्णजलैःसमुद्रसहिताःकुर्वन्तु मे मंगलम् ।।

ब्रह्मपुत्र सरीखे महानद की बात हो, सागर तटीय विस्तार या सिंधु-सरस्वती सभ्यता की या गंगा-जमुनी संस्कृति की, भारतीय संस्कृति जल केन्द्रित संस्कृति है। भारत की बहुचर्चित समस्याओं में नदी जल प्रदूषण भी एक है। नगर पालिकाओं, अनियंत्रित कारखानों, और अज्ञानी समूहों द्वारा प्रदूषित किया जाता जल मानव के साथ पशु-पक्षियों, विशेषकर जल-प्राणियों के लिए भी क्षतिकर है। लेकिन बात प्रदूषण पर ही नहीं रुकती। प्रमुख नदियों में बाढ़ से हर साल होने वाली जन-धन की हानि बहुपक्षीय है। मेरे खेत के बीच से गुज़रने वाली नदी खेत को हर बरसात में अपनी मर्ज़ी से काटती-छांटती रहती है। चौमासे में जब ऐसी छोटी नदियां प्रमुख नदियों में मिलती हैं तब गाँव के गाँव बह जाते हैं, मिट्टी की उपजाऊ परतें बह जाती हैं। बाढ़ में आई मिट्टी और मलबा नदियों की गहराई को कम करके बाकी वर्ष में उसके प्रवाह को भी बाधित करता है। आइये देखते हैं, नदियों के समग्र विकास के लिए और क्या क्या किया जा सकता है, क्या-क्या किया जाना ही चाहिए।

समस्या
  • विभिन्न प्रकार के प्रदूषण
  • सूखे-बाढ़-भूस्खलन आदि की विभीषिका
  • मूर्ति विसर्जन आदि कार्यक्रमों के प्रभाव 
  • डूबने से होने वाली मृत्यु
  • अवैध वालुका-पाषाण खनन
  • अवैध मत्स्य-जलजीव-दोहन
  • जल परिवहन

गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ।।

कुछ अवलोकन और सुझाव

प्रदूषण पर रोक
चाहे कारखानों से आने वाला प्रदूषण हो चाहे नगरपालिकाओं के जल-मल द्वारा, उसे हर हाल में नदीजल में मिलने से रोका जाये। नियमों के हर उल्लंघंकर्ता को पर्याप्त सज़ा दी जाये। नगर निगमों की लापरवाही की स्थिति में पार्षदों, अधिकारियों आदि की ज़िम्मेदारी निश्चित करके उन्हें भी चेतावनी और सज़ा दी जाये। स्कूली शिक्षा में प्रदूषण के दुष्प्रभावों के साथ उनसे बचाव के तरीके भी बताए जाएँ।  

तटबंध
पक्के तटबंध नदियों को सीमाबद्ध रखने में सहायक सिद्ध होते हैं। आरंभ प्रमुख नदियों पर बसे प्रमुख नगरों से किया जा सकता है। इस पहल के लिए काशी एक अच्छा उदाहरण सिद्ध हो सकता है जहां गंगा पर संसार भर से तीर्थयात्री आते हैं। पुराने बने घाटों का पुनरुद्धार हो। जिस ओर किनारे नहीं हैं वहाँ जलचर जीवन को प्रभावित किए बिना नव-निर्माण किया जाये।

अंतिम संस्कार
देश भर की नदियों के लिए सामान्य अन्य प्रदूषणों के साथ-साथ काशी में गंगातीर पर एक अन्य कार्यक्रम भी बड़े स्तर पर प्रदूषण में सहायक हो रहा है। विभिन्न स्थलों पर हो रहे क्रियाकर्म को भी नियमन की आवश्यकता है। बहाये गए या अधजले शव तथा अन्य दहन-संस्कार सामग्री को नदी के जल में मिलने से रोकना चाहिए। काशी जैसे प्रमुख संस्कार स्थल पर विद्युत शवदाह की समुचित व्यवस्था भी होनी चाहिए। यदि और कोई तरीका काम नहीं करता तो धारा को दो भागों में बांटकर संस्कार क्रिया व स्नान क्रिया की धाराएँ अलग-अलग रखी जा सकती हैं ताकि शवदाह क्षेत्र का बेहतर प्रबंधन हो सके। शवदाह-क्षेत्र का जल शोधित करने के बाद ही मुख्य धारा में वापस मिलाया जाये।

नदी की गहराई और अवैध वालुका-पाषाण खनन
देश में नदी समस्या का एक प्रमुख कारण नदियों का उथला होना भी है। समय के साथ नदियों में आई रेत-मिट्टी-बजरी आदि उन्हें उथला करती जाती है। किनारे के खेतों की कटान और बाढ़ में बहाकर लाये गए मलबे से भी गहराई पर असर पड़ता है। बड़े-बड़े बांधों में पानी को रोककर रखे जाने से नदी का प्रवाह भी धीमा हो जाता है, इस कारण भी रेत नदी तल पर इकट्ठी होती रहती है। जलजीवन को क्षति पहुंचाए बिना, पत्थर और बजरी के वैज्ञानिक, योजनाबद्ध नियमित, और नियंत्रित खनन से नदी की प्रशस्त गहराई बनाये रखी जा सकती है और उनकी जलधारण क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। इससे नदी के जलचर जीवन सहित नदी परिवहन, जल-क्रीडा आदि की भी वृद्धि होगी।

राष्ट्रीय पुल नीति
पुल निर्माण की एक राष्ट्रीय नीति बने जिससे पुलनिर्माण के ऐसे नियमों (यथा, मानक ऊंचाई) का पालन निश्चित किया जा सके जो पर्यावरण, जलचर जीवन और जल-परिवहन के अनुकूल हों।

नदी जल परिवहन
देश में नदियों के सघन जाल होने के बावजूद नदी जल परिवहन की संभावनाओं का संचित दोहन अब तक नहीं हुआ है। ऊंचे नीचे अनियमित पुल, घाटों का अभाव, गहराई की कमी, बांधों द्वारा जल की अवैज्ञानिक रोक के साथ साथ जल-परिवहन की पारदर्शी नीति का अभाव आदि जैसे अनेक कारणों से देश में जल परिवहन लगभग अनुपस्थित है। उचित परियोजनाओं द्वारा कमियों का निराकरण करके जल परिवहन को प्रोत्साहित किया जाये तो परिवहन की लागत में कमी आने के साथ-साथ रेल और सड़क मार्ग पर बढ़ता दवाब तो कम होगा ही, जल परिवहन से संबन्धित वे उद्योग जो आज तक उपेक्षित रहे हैं, आगे बढ़ेंगे।

बांध नियमन
बांध बनाते समय यह ध्यान रखा जाये कि वे नदियों को सुखाने का काम न करें। वैज्ञानिक अध्ययनों द्वारा हर नदी क्षेत्र के लिए एक नियमित प्रवाह तय किया जाये और उसे यथासंभव बनाए रखा जाये। नदियों की गहराई, पक्के किनारे बनाकर यदि उनकी जल-धारण क्षमता बधाई जाती है तो बांधों पर निर्भरता वैसे भी कम हो जाएगी और हर साल आने वाली नियमित बाढ़ विभीषिकाओं से भी बचा जा सकेगा।

अवैध मत्स्य-जलजीव-दोहन
जलचर दोहन ने देश की नदियों का बड़ा अहित किया है। अनियंत्रित मत्स्याखेट के चलते मछलियाँ, कछुवे आदि की संख्या तो कम हो ही रही है, सोंइस/शिशुक (Ganges-Indus blind dolphin) जैसे कितने ही जलचर लुप्तप्राय हो चुके हैं। व्यक्तिगत रूप से मैं जीवहत्या के विरुद्ध हूँ, फिर भी यदि सरकार इसे ज़रूरी मानती भी है तो सीमित समय के लिए वैध राजाज्ञा के बिना किसी भी प्रकार का शिकार गैरकानूनी घोषित किया जाना चाहिए। राजाज्ञा पाने वाले व्यक्तियों से पर्यावरण रक्षण के प्रति निष्ठा व्यक्त करने और निश्चित नियमावली का पालन करने का वचन लिया जाना चाहिए और राजाज्ञा शुल्क से प्राप्त आय को जलचर संरक्षण और प्रवर्धन के लिए प्रयुक्त किया जाना चाहिए।

मूर्ति विसर्जन आदि कार्यक्रम और डूबने से होने वाली मृत्यु
देश की समस्याओं का निराकरण देश के नागरिकों और परम्पराओं के दमन से नहीं होता। इसके लिए परम्पराओं और नागरिकों के ज्ञान और सहयोग का सहारा लिया जाना चाहिए। विभिन्न पर्वों के बाद आयोजित मूर्ति विसर्जन कार्यक्रमों में हर बार कितने ही लोगों, विशेषकर किशोरों की अकालमृत्यु की खबरें आती हैं क्योंकि इन कार्यक्रमों में भी देश के अन्य स्थलों की तरह अनियमितता और अव्यवस्था का राज होता है। अधिकांश भागीदारों को तैरना नहीं आता है। पुलिस प्रशासन भी नहीं होता है और न ही प्राथमिक चिकित्सा और एंबुलेंस की व्यवस्था होती है। ऐसे समारोहों के लिए निश्चित नियम बनें और उनका कड़ाई से पालन हो। मेरे मन में आए कुछ विचार निम्न हैं:
  • मूर्ति विसर्जन के लिए अलग घाट बनें जिनकी गहराई कम हो 
  • जीवन रक्षक तैराकों, गोताख़ोरों और पुलिस की विशेष व्यवस्था हो।
  • केवल परंपरागत ढंग से बनी उन biodegradable मूर्तियों को ही विसर्जन की इजाज़त हो जिनमें किसी विषाक्त पदार्थ, रंग आदि का प्रयोग न हुआ हो।
  • अनुज्ञप्त मूर्तियों के आकार और भार की सीमा तय हो और विसर्जन क्षेत्र के प्रवेशद्वार पर इन मानकों की जांच हो। 
  • बेहतर तो यह होगा कि इन मानकों से रहित मूर्तियों के विक्रय पर ही रोक लगे। 
  • हर उल्लंघन और दुर्घटना पर कड़ी कार्यवाही की जाये। 
  • पर्व के दिनों में छात्रों को स्कूलों में पर्यावरण और व्यक्तिगत सुरक्षा की जानकारी दोहराई जाए। 
  • समारोह के बाद विसर्जन-क्षेत्र का जल शोधित करने के बाद ही मुख्य धारा में मिलाया जाये। 
जल-क्रीड़ा व प्रशिक्षण
नदी-तट कें क्षेत्रों के विकास, जल-क्रीड़ा और पर्यटन का विकास किया जाना चाहिए। ध्यान यह रहे कि इसमें मनोरंजन और धनार्जन के साथ-साथ सामाजिक सहयोग और सशक्तीकरण भी जोड़ा जा सके। जिसके लिए इन क्षेत्रों में तरण ताल बनाकर स्थानीय बच्चों को तैराकी और संबन्धित कौशल व खेलों में प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाने चाहिए।

जल-पुलिस
केंद्रीय बलों की तर्ज़ पर आधुनिक सुविधाओं से युक्त जल पुलिस संगठन का गठन किया जाना चाहिए जो नदी जल-क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था और जल परिवहन नियमन के साथ-साथ नदी-पर्यावरण के विरुद्ध होने वाले अपराधों की रोकथाम कर सके।

केंद्रीय नदी-जल समेकित संस्थान
यदि कोई केंद्रीय संस्थान देश भर की नदियों की समेकित ज़िम्मेदारी का वहन कर सके तो प्रदूषण,मत्स्य-पालन, या परिवहन आदि के लिए अलग अलग आधी-अधूरी परियोजनाओं में संसाधनों की बरबादी से बचा जा सकेगा। नीति व नियम निर्धारण और अनुपालन के लिए ऐसे केंद्रीय संगठन का निर्माण किया जाना चाहिए जो राज्यों और नगर पालिकाओं के सहयोग से राष्ट्र की नदियों, नहरों आदि की ज़िम्मेदारी ले सके और आपद्काल में जन-सुरक्षा के काम में सहयोग भी कर सके।



गुरुवार, 22 मई 2014

मनन शाला में आपका स्वागत है

देश और संसार के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हम देश की महत्वपूर्ण समस्याओं के बारे में सोचते हैं। भारत और भारतवासी मननशाला के केंद्र में हैं। इसके सदस्य भारत के साधारण नागरिक है और देश और संसार के प्रति अपने यथासंभव योगदान के प्रयास में विश्वास रखते हैं। आपके विचारों और सुझावों का स्वागत है। यदि आप इस प्रयास में हमारी सहायता करना चाहते हैं तो कृपया किसी ऐसे मुद्दे पर अपने विचार यहाँ रखें जो आपके अनुसार देश के लिए महत्वपूर्ण है।

धन्यवाद और शुभकामनायें!